Wednesday, November 10, 2010

भ्रष्टाचार


भारत भ्रष्टाचार का गढ़ बन चुका है ,इसमें कोई संशय नहीं ,ग्राम पंचायत एक सं लेकर पुलिस, न्यायालय और राजनीति तक सभी भ्रष्टाचार की गिरफ्त में हैं ! राष्ट्र की स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि ! हम अपनी खुद की जेबों पर ही डाका डालने के आदी हो चुके हैं ,अपने ही भाई बहिनों की मजबूरियों को नकदीकरण करने की विधियां खोजने में लगे रहते हैं ! नित्य ही प्रत्येक का पाला किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार दानव से पड़ता है ! इस देश की हालत यह है कि यहाँ स्कूल खोलने या चलाने वालों से उसकी योग्यता और क्षमता तथा अनुभव नहीं पूछा जाता और न स्कूल खोलने की मान्यता नियमों व शर्तों में इनका कोई स्थान है , वरन् स्कूल खोलने वाले के पास कितना धन है ,कितनी जगह है,कितनी सुविधायें हैं यह महत्वपूर्ण है ! यानि कोई धन्ना सेठ ही स्कूल खोल सकता है भले खुद पूरी तरह सौ के सौ टके अंगूंठा टेक हो ! यहाँ सरकारी विभाग मान्यता बेचता है ,एक व्यवसायी उसे खरीदता है और फिर वह यथा सुविधा तथा वसूली के हिसाब से पब्लिक को लूटता है ! यानि सरकारी लायसेन्स प्राप्त लुटेरे ! यदि सर्वथा पढ़ा लिखा और सक्षम व योग्य बेरोजगार  ,जो स्कूल की मान्यता खरीद नहीं सकता है वह या तो प्रायवेट टयूशन पढ़ाये या फिर किसी धन्ना सेठ के यहाँ चार पांच सौ रूपये महीने पर स्कूल की नौकरी करे ! प्रायवेट टयूशन पढ़ाना भी आज के जमाने में हंसी खेल नहीं रहा ! वह भी पूरी तरह व्यावसायिक मार्केटिंग के रूप में ढल चुका है ! शुध्द रूप से सड़क पर खड़े एक बेरोजगार को न तो व्यावसायिक मार्केटिंग करना आती है और न उसके पास इतना धन ही होता है , सो उसकी तमाम योग्यताओं के बाद भी यहाँ भी उसकी असफलता परम स्वाभाविक ही है ! सो वह स्वत: ही पुन: किसी धन्ना सेठ के यहाँ कोचिंग मे गुलामी के लिये ही जायेगा ! उपरोक्त उदाहरणों से क्या आपको नहीं लगता कि  भ्रष्टाचार शोषण का सृजक भी है  संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार ''समानता के अधिकार'' का भी भ्रष्टाचार परम अतिक्रामक है !  सरकारी दफ्तर आजकल बिना तराजू बांट के सरकारी अनुमोदन और मान्यता या प्रमाणीकरण या पंजीयन आदि आदि बेचने की दूकानें मात्र बन कर रह गये हैं !   लोक सेवक अब लोक सेवक न होकर हुकूमती दरोगे बन चुके हैं !  आम आदमी लोकतंत्र में सबसे तुच्छ प्राण बन कर रह गया है !  वोट या मतदान की कीमत केवल चन्द दिल बहलाऊ चुनावी वायदे बन कर रह गयी है !  सरकारी गोपनीयता और शासकीय कार्य व्यवधान की आड़ में एक तगड़ा साजिशी खेल खेला जा रहा है ,जिसने भारतीय लोकतंत्र की बुनियादें हिला दीं है ! सुविधा शुल्क या रिश्वत या भेंट, उपहार आदि सरकारी लोगों के लिये अनिवार्य रिवाज या परम्परा बन चुके हैं ! साधारण आदमी किस कदर सरकारी कार्यालयों में बेइज्ज्त होता है और एक फाइल महीनों लटका कर आखिर में जानबूझ कर खारिज कर दी जाती है !पैसा देकर घर बैठे सरकारी आदेश हाथ आ जाते हैं !देश की मध्यम वर्ग की जनता की 60 प्रतिशत रकम की लेनदारी और देनदारी केवल रिश्वत में ही चली जाती है । आज देश का हर आदमी ही दुखी है भ्रष्टाचार के दानव से ,वे भी इससे दुखी हैं जो खुद भ्रष्ट हैं ,वे बेचारे किसी और से लेकर आते हैं और दूसरा उनसे ले जाता है ! मौका पड़े तो एक छोटा सा सिपाही टी. आई .या थानेदार पर से भी रिश्वत ले लेता है !

स्थिति इतनी बदतर हो गयी है कि, सरकारी नौकरी करने का उददेश्य देश भक्ति और जन सेवा न होकर महज दो नंबर की कमाई के लिये एक सरकारी पटट्ा हासिल करना मात्र रह गया है ! यदि किसी पर झूठा भी आरोप हत्या का मढ़ जाये पुलिस और वकील उसके सारे कर्म कर डालते हैं ,रही बची कसर अखबार पूरी कर डालते हैं ! पुलिस अंतिम दम तक उसकी जमानत नहीं होने देती और  जेल में तब तक सड़ाने की कोशिश करती है तब तक कि फैसला न हो जाये और हमारे यहाँ फैसलों की यह हालत है कि एक एक मुकदमें को वर्षो सुनवाई होने में लगते हैं ! तब तक कई बसे बसाये आशियाने पूरी तरह नेस्तनाबूद हो चुकते हैं ! भले ही बाद में मुल्जिम निर्दोष सिध्द पाया जाये ! बाद में वकील या पुलिस सभी यह कह कर पिण्ड छुड़ाते हैं कि ''हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि हाथ '' दिलचस्प पहलू देखिये , हत्या के झूठे आरोप मात्र में बन्द आदमी के जो कर्म कर डालते हैं वही लोग अपने खुद के घरों में हत्यारों की ही पूजा करते हैं ,कौन होगा जो कृष्ण को नहीं पूजता होगा
दरअसल हम भारत वासी दोहरा चरित्र जीते हैं ,दिन भर जिसकी बुराई करते हैं रात को वहीं उसी की शरण या सान्निध्य में पहुंच जाते हैं ! वेश्या हो या भगवान जिसका अस्तित्व जो सार्वजनिक रूप से नकारा करते हैं ,अक्सर वे वहीं अंतत: जाते हैं ! सार्वजनिक रूप से शराब की निन्दा करने वालों को मैंने महफिलों में झूमते देखा है ! रिश्वत पर लम्बे भाषण की चाशनी बिखराने वालों को मैंने भ्रष्टाचार के समुंदर में अथाह गोते लगाते देखा है ! एक कहावत है कि ''बद अच्छा, बदनाम बुरा'' लगभग यही हालत सरकारी कार्यालयों की है ! वे बुरा काम करना चाहते हैं मगर बिना बदनाम हुये ! मेरे एक मित्र बहुत बड़े सरकारी पद पर थे ,मैने कभी कभार मजाक में उन्हें रिश्वत खाने पर उलाहना दिया , और उन्हें उनके इस बुरे काम के कई बुरे परिणाम समझाये और कहा कि बेटा बच के खेलना नही ंतो किसी न किसी दिन तगड़े निबटोगे ! वे हल्के से मुस्कराये और बोले अरे यार ''लेते पकड़ गये तो, दे के छूट जायेंगें ''

भारतीय दण्ड संहिता में कुल 511 धारायें हैं, अंग्रेजो को खतरा कृष्ण से था और उससे भी बड़ा खतरा कृष्ण की विचार धारा मानने वालों से था ! अगर भारतीय दण्ड संहिता को कृष्ण से मिलाया जाये तो मुझे नहीं लगता कि काेई धारा उसमें ऐसी हो जो कृष्ण पर लागू नहीं होती हो ! और सारी की सारी धाराओं में कृष्ण मुल्जिम न बनते हों ! कृष्ण गीता में भले ही कह गये हों या धमका गये हों कि ''मैं फिर फिर आऊंगा और हत्यायें करूंगा ! मगर सच ये है कि कृष्ण की मजाल नहीं जो अवतार ले कर दिखायें ! अगर आ गये कृष्ण तो भारत का शायद ही कोई थाना बचे जो हथकड़ी टांग कर कृष्ण को न ढूंढ़े ! फिर वही यक्ष प्रश्न कि क्या कोई ऐसा काम कृष्ण ने किया कि जिसे हम अपराध नहीं मानते ?
अब कृष्ण को मानने वालों का हश्र भिन्न कैसे हो सकता है !

आम भारतीय लगभग त्रस्त होकर उकता चुका है ! कभी कभार न्यायालयीन फैसलों की अच्छी  बुनियादें  उसमें उम्मीद की किरण फिर से जगा देतीं हैं , तो कई बार कुछ अच्छे मिसाली पुलिस अफसर उसमें फिर से एक जोश भर देते हैं और वह फिर लोकतंत्र को श्रध्दावनत होकर निहारने लगता है !भारतीय जीवन दोहरे माप दण्डों के घेर में है , चलो अंग्रेजो को तो हमें रोकना ही था मगर हम अब भी खुद को रोकें हैं यह तगड़ा विरोधाभास है, वे कृष्ण को नहीं आने देना चाहते थे बात लाजमी है ,मगर हम कृष्ण को आने से रोके बैठे हैं यह विरोधाभास है !सी. बी.एस.ई. ने राम और कृष्ण को काल्पनिक कहा यह अपने पुरखाें और बाप को काल्पनिक कहने वाली बात है ,क्या कल आने वाले समय में गांधी और नेहरू काल्पनिक नहीं होंगे ! यदि राम और कृष्ण किसी ने नहीं देखे तो ऐसे कितने होंगें ! जिन्होंने गांधी या नेहरू को देखा होगा ! चलो यहाँ तक ठीक है ! भारतीय गणराज्य का सर्वोच्च अधिपति महामहिम राष्ट्रपति देश को तथाकथित काल्पनिक कृष्ण के जन्म दिवस जन्माष्टमी पर राष्ट्र को शुभ कामनायें देता है यह विरोधाभास है, हमारा गौरवशाली जन नायक प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री उसी काल्पनिक कृष्ण के जन्म दिन पर लोगों को शुभ कामना संदेश देता है यह विरोधाभास है !

3 comments:

  1. bahut achha likhte hai aap
    iske liye shukriya

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  2. Sabase bade bharstari29 December 2010 11:18 pm

    आपकी लेख अच्छी है व विचारणीय है.आज आम आदमी की नजर में सबसे ज्यादा भर्स्ताचारी पुलिस या राजस्व विभाग वाले हैं,लेकिन मेरी नजर में वन विभाग,आबकारी विभाग, वाणिज्य कर विभाग तथा परिवहन विभाग सबसे बड़ा भार्स्ताचार का केंद्र है.छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में ये चारो विभाग बड़े नेताओं और अधिकरियों का चारागाह है.वनविभाग के जितने भी रचनात्मक कार्य हैं उसमे ८०% तक भार्स्ताचार होता है ,२०१० में कराये गए कार्य का प्रमाण मिला जिसकी शिकायत मैंने राज्य के राज्यपाल जी से की है. आबकारी विभाग के भार्स्ताचार से आम जनता प्रभावित होती है.वाणिज्य तथा परिवहन विभाग के बेरियर में लाखों रु. अवैध तरीके से रोज वसूली की जाती है वहीँ उड़नदस्ता के कर्मचरियों द्वारा ट्रक वालों से न जाने कितनी राशि वसूली की जाती होगी . कहा जाता है कि इस विभाग वालो कि करतूतों की शिकायत जिस फोरम करना चाहे कर लो लेकिन होता कुछ भी नहीं. फिर भी मैं 'सूचना के अधिकार' के तहत जानकारी लेकर सम्बन्धित कार्य का अवलोकन तथा उस कार्य को करने वालों से बातचीत कर विडिओ रिकार्डिंग कि सी.डी सहित राज्य के राज्यपाल जी से की है .अब देखना होगा भ्रस्ताचारियों के खिलाफ क्या कार्यवाही होती है.

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  3. Hon,ble Delhi High court allowed file PIL against “Indian Rupee symbol selection process”.

    Link..
    http://www.saveindianrupeesymbol.org/

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